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महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी से नागपुर के सम्मानित साहित्यकारों का 'नगर सत्कार' संपन्न


नागपुर। विगत दिनों मुंबई में आयोजित महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के वर्ष 2024- 25 के पुरस्कारों से सम्मानित होने वाले नागपुर के साहित्यकारों के नगर सत्कार का एक सार्थक समारोह अकादमी की नागपुर प्रतिनिधि और उपाध्यक्ष प्रियंका शक्ति ठाकुर की अध्यक्षता में विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के साकेत सभागार में संपन्न हुआ।मीरा जोगलेकर की सरस्वती वंदना के बाद प्रियंका ठाकुर का स्वागत रूबी दास 'अरु' ने किया।


संचालन करते हुए प्रस्तावना में साहित्यकार अविनाश बागड़े ने अकादमी पुरस्कृत और जिन्हें इस वर्ष सम्मान नहीं मिल सका ऐसे व्यक्तियों की क्रमशः अच्छी और  बुरी प्रतिक्रियाओं को एक सहज मानवीय प्रवृति बताया।

मुख्य कार्यक्रम के  साहित्यकारों सर्वश्री इंदिरा किसलय, कृष्ण नागपाल, प्रभा ललित सिंह, सत्येंद्र प्रसाद सिंह, माधुरी मिश्रा और संतोष बादल ने तीनों सत्कार मूर्तियों का सत्कार किया। तत्पश्चात तीनों अपने अपने  मनोगत व्यक्त करते हुए कुछ यूं बयान किया।

श्रीमती आभा सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा- मुझसे पूछा गया कि क्या साहित्यकार पुरस्कारों के भूखे होते हैं? अव्वल तो भूख शब्द ही गलत है।पुरस्कार या सम्मान को लक्ष्य कर कोई भी शब्दशिल्पी रचना नहीं करता।रचना में अन्तर्हित सत्य ही उसे सम्मान दिलाता है।रचनाकार का काम है पूरी निष्ठा से  लेखन करना अगर उसका लेखन उत्कृष्ट है तो पाठक उसे निश्चय ही श्रेय देंगे।पाठकों की प्रियता से बड़ा पुरस्कार कोई नहीं।गीता में वर्णित संदेश ही सारे सवालों का उत्तर है।

डाॅ मनोज पाण्डे की स्वाभाविक उक्ति थी कि हर व्यक्ति को सम्मान अच्छा लगता है। सच्चे सम्मान से उर्जा मिलती है।लेखक की हौसला अफजाई के लिए जरूरी है।सृजन सत्य का अभिप्रमाणन है यह।सम्मान उसी को मिलना चाहिए जो उसका हकदार है। प्रारब्ध से जो कुछ मिला उसे और अधिक बेहतर बनाने का प्रयास होना चाहिए।

समाज में गुरुतर दायित्व अध्यापक का होता है क्योंकि वह समाज को दिशा प्रदान करता है। मुझे "प्रयोजनमूलक हिन्दी-प्रयोग और प्रकृति "पर पुरस्कार मिला। युवाओं को ऐसी हिन्दी सिखाई जाये जो दैनंदिन जीवन में उपयोगी हो।रोजगार में सहयोगी कौशलपरक हिन्दी को कृति में छात्रों के समक्ष रखा गया है।जीवन जगत के हरक्षेत्र में हिन्दी के किस किस रूप का प्रयोग होता है यह दर्शाया गया है।

श्री रामकृष्ण सहस्त्रबुद्धे ने निरूपित किया कि सम्मान तो सृजनधर्मिता का प्रतीक है। मेरे सृजन के पहले पाठक मेरे पिता थे।पुरस्कार प्रेरणा देते हैं  साथ मे समाज को दिशा देने की चुनौती भी पेश करते हैं।शब्दों की सार्थकता इसी में है कि वह पाठक को आन्दोलित करे। हम अगर शब्दोपासक हैं तो उसके प्रयोग के प्रति सचेत रहें।वैचारिक परिवर्तन की  भूमिका में खरे उतरते हैं तो यह सृजन का सच्चा अवदान है।

श्रीमती प्रियंका ठाकुर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि पद की गरिमा मेंटेन करना  डिफिकल्ट टास्क है। नागपुर के रचनाकारों के लिये सम्मान का यह उत्सव अत्यन्त सुखद है।विशेषतः महिला रचनाकारों को मिलना गौरव पूर्ण है क्योंकि वे घर और नौकरी व्यवसाय के साथ लेखन का चुनौतीपूर्ण दायित्व संभालती हैं।सम्मान सभी को आनंद देता है। सम्मान किसे मिला यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है नैष्ठिक सृजन।नागपुर, साहित्य के क्षेत्र में उत्तरोत्तर अपना महत योगदान दर्ज कर रहा है। 'स्वर्णिम साल आर एस एस' -पर मैं काम कर रही हूं। चाहती हूं यह पाठकों तक पहुँचे।चाहती हूं महिला सत्कारमूर्ति ज्यादा हों।

इंप्रेशन देते हुए श्री टीकाराम साहू आजाद ने स्पष्टतः संकेत दिये कि सम्मान प्रोत्साहित करता है।अखबारों से साहित्य गायब होता जा रहा है।श्रेष्ठ लेखन लोगों तक न पहुँचे तो उसकी उपादेयता क्या है।ऐसे कार्यक्रम श्रेष्ठ लेखन को प्रवृत्त करते हैं।

आभार प्रदर्शन करते हुए श्री एस पी सिंह ने 'जमीन के हर जर्रे को आफताब कर देंगे' इस विश्वास को सृजन की नींव बताया।कहा कि जब तक हम दूसरों की खुशियों में शरीक न होंगे, हमारी खुशी में कौन शरीक होगा।ऐसे आयोजन दोहरी अर्थवत्ता से संयुक्त होते हैं।

कार्यक्रम के गरिमामय स्वरूप को द्विगुणित करने हेतु साकेत सभागार में, सर्वश्री किशन शर्मा, सुप्रसिद्ध मंच संचालक, नीरज श्रीवास्तव संपादक पावर ऑफ वन, अजय पांडे वरिष्ठ पत्रकार, मुकेश कुमार सिंह,पूनम मिश्रा, देवयानी बनर्जी, बनर्जी सर, सिंह साहब, रामटेके सर, रुचिता, डॉ सुमिता कोंडबतुनवार, मंजूषा किंजवड़ेकर और उमाशंकर नामदेव प्रमुखता से उपस्थित थे।
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