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नागपुर की IDMS Vigilant का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा कदम

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UAE की एलेक्ज़ेंडर इंटरनेशनल वर्क्स LLC के साथ छह खाड़ी देशों के लिए विशेष चैनल पार्टनरशिप समझौता रक्षा, एयरोस्पेस और सुरक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत–यूएई सहयोग को मिलेगी नई दिशा; स्वदेशी तकनीकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की पहल नागपुर/दुबई। महाराष्ट्र के नागपुर स्थित IDMS विजिलेंट डिफेंस टेक्नोलॉजीज Pvt. Ltd. ने भारत के स्वदेशी रक्षा एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण पहल करते हुए दुबई स्थित अलेक्ज़ेंडर इंटरनेशनल वर्क्स LLC के साथ विशेष चैनल पार्टनरशिप समझौता किया है। 14 अक्टूबर 2026 को हस्ताक्षरित इस समझौते के तहत Alexander International Works LLC को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के छह देशों में IDMS Vigilant के सहमत उत्पादों, तकनीकों और सेवाओं के प्रचार एवं व्यावसायिक विकास के लिए विशेष चैनल पार्टनर नियुक्त किया गया है।  यह साझेदारी भारत की स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं और खाड़ी देशों की रक्षा, एयरोस्पेस, आंतरिक सुरक्षा तथा रणनीतिक सहयोग संबंधी आवश्यकताओं के बीच सेतु स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे दोनों देशों के बीच व्यावसाय...

एक पल की कीमत

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पल पल जीते जीते कभी कभी जीवन की लंबी राह में लोग इक पल के लिए  अचानक गम्भीर हो जाते मजबूर होकर अपने बारे में सोचते         ठिठक के खड़े हो जाते  उस थमे से इक छोटे से पल में किसी को जिंदगी समझती है तो किसी की जिंदगी बिखरती हैं वैसे देखा जाए तो पल आता है किसी आकलन के पहले चला जाता हैं पल कभी बारात के साथ बैंड गाजे साथ आता है तो कभी पतली गली से चुप चाप निकल लेता है पल किसी के लिए  अलग अलग से नहीं आता राजा के लिए खास  और गरीब के लिए आम नहीं आता ये बात समझने में  हमारे नेताओं को सालों लग गये ये एक पल में भगवान के भी सामने वीआयपी बन गये। एक एक पल की कीमत अपनी अपनी तरह से समझ में आती हैं किसी के साथ एक पल एक युग के समान तो किसी और के साथ वही युग एक पल के समान बदलते हम  ही हैं हमारी सोच भी बदलती हैं किसी अपने ने अपने के एक हां के लिए एक पल अपने तरफ आस भरी  नजरों से देख कर बड़े बेमन से राह पकड़ ली थी उस एक पल की देर ने अपनी पुरी जिंदगी की रफ्तार को रोक के रखा हैं  रुकी रुक...

ख़ुद के घर में ये अजनबी कौन ?

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              मैंने स्वयं से पूंछा- अपने ही घर में ये अजनबी है कौन ? अंदर  से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं मिली। केवल दीवारों ने चुपचाप कहा घर का होना और अपना होना दोनों  में  बहुत फर्क है । मैंने फिर स्वयं से ही पूंछा  ये अधूरे ख़्वाब तब भला किसके थे?जो मैंने बड़े  उत्साह से बुनें थे या फिर  मेरे उन नयनों के, जिन्होंने मुझे मेरे होने से पहले ही मेरे  वजूद को परिभाषित कर दिया था? साँसें भी कभी अपनी होती हैं? हर श्वास तो समय से उधार ली गयी  चेतना है , फिर किस अधिकार से मैं जीवन को अपना  मानता  रहा? मैंने झरोखे  से बाहर देखा बाहर क्षितिज साफ़ था हां! दूर कहीं दूर बादलों का झूंड  अठखेलियां करते हुए ज़रूर नज़र आ रहा था। न कोई घर, न कोई छत। तब समझा, सीमाएँ बाहर कम,और हमारे  भीतर ही अधिक होती हैं। मैंने अंतिम बार फ़िर स्वयं से पूंछा क्या सितारों पर सचमुच में किसी का कोई अधिकार  है? इस बार भी भीतर से  ख़ामोशी ही मिली कोई उत्तर नहीं मिला। मैं ...