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तेरी बातें


बात पे बात निकली
जज़्बात की बात आई,
कुछ बात लिखना चाहा
कलम पे तेरी ही
बात आई ।

बातों ही बातों में 
ये क्या ग़ज़ब हो गया 
जो बात छुपा रक्खा था 
आज सरेआम हो गया ।

ये बहाना भी खूब है 
हम पर ज़ुल्म ढाने का
बेचारा दिल घायल हुआ
ख़ंजर सी नज़र का।

- डॉ. शिवनारायण आचार्य ‘शिव’
  नागपुर, महाराष्ट्र 

काव्य 7860292502168130708
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