मराठी सिनेमा ने एक महान कलाकार खो दिया : विलास उजवने का दुखद निधन
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नागपुर। मराठी रंगमंच और फिल्म के अत्यंत प्रतिभाशाली, बहुमुखी प्रतिभा के धनी और लोकप्रिय अभिनेता विलास उजवने का शुक्रवार शाम 6.30 बजे निधन हो गया। उनके आकस्मिक निधन से मराठी कला जगत शोक में डूब गया है तथा प्रशंसक और साथी कलाकार भी गहरे दुःख में हैं।
विलास उजवने ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत थिएटर से की थी। वह एक उत्कृष्ट चित्रकार के रूप में जाने जाते थे। बाद में उन्होंने कई मराठी धारावाहिकों और फिल्मों में काम करके अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने अपनी सहज अभिनय शैली से दर्शकों का दिल जीत लिया।
विलास उजवने की खासियत यह है कि उन्होंने हास्य, गंभीर, ग्रामीण और शहरी सहित विभिन्न प्रकार की भूमिकाएं कुशलतापूर्वक निभाई हैं। उनकी संवाद अदायगी, चेहरे के भाव और प्रस्तुति शैली ने प्रत्येक भूमिका को आकर्षक बना दिया।
उन्होंने 'देवकी', 'जय मल्हार', 'तुज्यात जीव रंगाला' और 'चला हवा येउ द्या' जैसे धारावाहिकों में आकर्षक भूमिकाएं निभाईं। ग्रामीण भूमिकाओं में उनकी छाप अधिक स्पष्ट थी। उन्होंने फिल्मों में भी अपनी प्रतिभा साबित की थी।
उनके निधन के बाद कई मशहूर कलाकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी संवेदना व्यक्त की है। कई साथी कलाकारों ने कहा, ‘विलासदादा एक बहुमुखी कलाकार थे, उनकी विरासत को हमेशा याद रखा जाएगा’।
विलास उजवने सिर्फ एक कलाकार ही नहीं थे, बल्कि एक मुस्कुराते, प्यारे और हमेशा सकारात्मक व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे। उनकी हंसी की लहरों ने कई लोगों के जीवन को रोशन कर दिया। उन्होंने गांव-गांव जाकर नाट्य भ्रमण के माध्यम से दर्शकों के साथ रिश्ता बनाया था।
उनके निधन से मराठी मनोरंजन उद्योग में जो शून्य पैदा हुआ है, उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। उन्होंने अपने काम के माध्यम से मराठी संस्कृति को प्रदर्शित किया और दर्शकों को आत्मनिरीक्षण का अनुभव प्रदान किया।
विलास उजवने को अंतिम विदाई देने के लिए कई प्रशंसक और सहकर्मी उनके घर पहुंचे। उनके निधन से जो स्मृतियां बची हैं, वे उनकी अमर भूमिकाओं के माध्यम से जीवित रहेंगी।
कला जगत में उनकी यात्रा केवल अभिनय तक ही सीमित नहीं थी। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी थी और इसलिए उनकी भूमिकाओं में विद्वत्तापूर्ण गहराई महसूस की जाती थी। रंगमंच से लेकर रूपहले पर्दे तक का उनका सफर नाटक के प्रति उनके प्रेम से पैदा हुआ।
डॉ. विलास उजवने अक्सर सामाजिक विषय वाली फिल्मों में भूमिकाएँ निभाते थे। 'डोम' और 'इन द नेम ऑफ ताई' जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसे किरदार निभाए जो सामाजिक असमानता, अन्याय और मूल्यों के क्षरण की ओर इशारा करते थे। उनके संवाद और शारीरिक भाषा में एक ताकत थी - जो सीधे दर्शकों के दिलों तक पहुंचती थी।
उन्होंने ग्रामीण जीवन, संस्कृति और लोगों का सच्चा चित्र चित्रित किया। उनकी भूमिकाओं में ग्रामीण भावना थी। 'गांव आल गोट्यात 15 लाख खाता' या 'ढोलकी' जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने ग्रामीणों की आवाज बनकर सामाजिक यथार्थ को चित्रित किया।
उनके निधन के साथ, एक शांत, किन्तु गुणवत्तापूर्ण अभिनय शैली खो गई है, जो कभी भी अत्यधिक शोरगुल वाली नहीं थी, लेकिन जब बोलती थी, तो भावुक हो जाती थी और टकराव पैदा करती थी। मराठी सिनेमा उद्योग के लिए यह एक बहुत बड़ा अंतर है।
डॉ. विलास उजवने मराठी रंगमंच और फिल्म में अपनी बहुमुखी भूमिकाओं के लिए जाने जाते थे। लेकिन उनकी अभिनय यात्रा में एक विशेष मील का पत्थर संत तुकाराम की भूमिका थी। उन्होंने इस भूमिका को इतनी आस्था, समर्पण और आध्यात्मिक भावना के साथ निभाया कि यह दर्शकों के मन में अंकित हो गयी।
तुकाराम सिर्फ एक संत नहीं थे; यह एक विचार था, एक आंदोलन था, लोगों के मन में आस्था का स्थान था। ऐसे महान व्यक्ति की भूमिका निभाने के लिए न केवल अभिनय की आवश्यकता होती है, बल्कि उस चरित्र की भावना की भी आवश्यकता होती है। डॉ. उजवने ने इस भूमिका को निभाते हुए न केवल वेशभूषा और हाव-भाव पर जोर दिया, बल्कि उनके अभंगों की आध्यात्मिक ऊर्जा उनके अभिनय में झलकी।
वाणी और शारीरिक भाषा में संयम तुकाराम की भूमिका निभाते हुए। उजवने की आवाज की मधुरता, शांति और आंतरिक पीड़ा के संयमित चित्रण से दर्शक अभिभूत हो गए। तुकाराम को ‘साकार’ नहीं हो रहा था – वे ‘बन रहे’ थे। उनकी आँखों में भक्ति, उनके शब्दों में विश्वास और उनके शरीर के हाव-भाव में समर्पण - यह सब बहुत जीवंत था।
उन्होंने यह भूमिका मंच पर कई बार निभाई थी। ग्रामीण तमाशा, लोक नाटक और भजन मंडलियों के साथ मिलकर उन्होंने तुकाराम के विचारों को गांवों तक फैलाया। यह महज एक नाट्य कृति नहीं थी, बल्कि एक तरह का सामाजिक जागरूकता आंदोलन था।
डॉ. उजवने स्वयं संत साहित्य के विद्वान थे। इसलिए, उनके तुकाराम गायन में, अभंगों का प्रयोग न केवल गीतों में किया गया, बल्कि शब्दों के अर्थ, उनके पीछे के दर्शन और सामाजिक विद्रोह को भी प्रतिबिंबित किया गया।
आज भी कई दर्शक, प्रशंसक और कलाकार डॉ. तुकाराम के रूप में उज्वने के अभिनय को पसंद करते हैं, जब मैं उन्हें याद करता हूं तो मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं। जिस समर्पण के साथ उन्होंने इस भूमिका को निभाया वह अभिनय से परे था - यह समर्पण की भावना थी।
डॉ. विलास उज्वने की तुकाराम की भूमिका ने मराठी रंगमंच में भक्ति का एक नया अध्याय लिखा। वह एक कलाकार से भी अधिक एक विचार बन गये।
डॉ. विलास उजवने का नागपुर शहर से विशेष संबंध है। उन्होंने अपना बचपन और शिक्षा नागपुर में पूरी की। उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत नागपुर के थिएटर से की।
2024 में नागपुर में अखिल भारतीय मराठी नाट्य परिषद शाखा के वार्षिकोत्सव और पुरस्कार समारोह में उन्होंने युवा कलाकारों को मुंबई में अपने सपने पूरे करने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा, "नागपुर ने कई महान और प्रभावशाली कलाकार दिए हैं। मैंने स्वयं यहां अपने वरिष्ठों से बहुत कुछ सीखा है।"
डॉ. विलास उजवाने नागपुर के निवासी हैं। उन्होंने अपना बचपन और प्रारंभिक शिक्षा नागपुर में पूरी की। बाद में वह अभिनय में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चले गए। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा,’मैं नागपुर से हूं, लेकिन अब मैं मुंबई में बस गया हूं।’ उन्होंने मराठी और हिंदी सिनेमा उद्योग में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 2016 में विदर्भ गौरव प्रतिष्ठान ने उन्हें स्मिता पाटिल पुरस्कार से सम्मानित किया।
कुछ वर्ष पहले मुंबई मे उन्हें लकवा मार गया, जिससे उनके पैर, हाथ और बोलने की क्षमता प्रभावित हुई। इसलिए वे इलाज के लिए नागपूर हमारे पास आये। उन्हें बहुत लाभ हुआ और हमारा रिश्ता और मजबूत हो गया। उन्होंने हमारे घर पर शिष्टाचार भेंट की। वे यादें अब यादें ही रहेंगी। विलास उजवाने की आत्मा को शांति मिले, यही हमारी ईश्वर से प्रार्थना है।
- डॉ. प्रवीण डबली
वरिष्ठ पत्रकार