बचपन की यरियाँ
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बीते हुए पलों से फिर मिलना हुआ।
गुजरा था जिन गलियों में बचपन,
उन्हीं गलियारों से फिर निकलना हुआ।
चलो लौट जाये उन्हीं वादियों में,
जहाँ से ये बचपन रवाना हुआ।
दो उंगलियों के जोड़ से दोस्ती हो जाती,
मस्लहतों के दौर से अब दिल आज्ज़ा हुआ।
एक ज़रा सी बात पे जब नदियाँ बहती थी,
आज वो दिन की दर्द भी यहाँ पोशीदा हुआ।
परियों की कहानी, और नानी का दुलार,
कितना आसान हमें बहलाना हुआ।
‘अदाʼ चल मोहब्बत नापते है,
आज फिर टूटी हुई चूडियों का पैमाना हुआ।
(मसलहत - रणनीतीयं) (आजिज़ - तंग आना)
- डॉ. तौकीर फातमा
कटनी, म. प्र.